Sunday, April 28, 2013

ये ख़लिश दिल से क्यूं नहीं जाती..


ये ख़लिश दिल से क्यूं नहीं जाती,
रूह आराम क्यूं नहीं पाती,
है कोई मर्ज़ या कयामत है,
दवा कोई दुआ नहीं भाती..

बड़ी मुश्क़िल से बड़ी महनत से,
हुई नफ़रत हमें मुहब्बत से,
ये बला कौन आ पड़ी है गले,
नींद अब के ये क्यूं नहीं आती..

कल तलक तो सकून देती थी,
यही रग-रग को ख़ून देती थी,
है ख़फ़ा या है बेवफ़ा मुझसे,
आज मय क्यूं असर नहीं लाती..

न कोई आरज़ू अधूरी है,
न कोई पास है न दूरी है,
ख़्वाहिशें कब की मार दीं सारी,
आस-ए-दिल क्यूं ज़हर नहीं खाती..

ये ख़लिश दिल से क्यूं नहीं जाती,
दवा कोई दुआ नहीं भाती,
है कोई मर्ज़ या कयामत है,
रूह आराम क्यूं नहीं पाती..

8 comments:

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 01/05/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  2. संवेदना भरी मार्मिक रचना ।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (29-04-2013) 'सुनती है माँ गुज़ारिश ':चर्चामंच 1229 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. बढियां संवेदनापूर्ण रचना! पढकर अच्छा लगा!

    -Abhijit (Reflections)

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  5. बहुत अंतराल के बाद कुछ लिखा????

    बहुत अच्छी रचना....दिल को छूती....

    अनु

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  6. बहुत प्यारी पंक्तिया है।।

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  7. very informative post for me as I am always looking for new content that can help me and my knowledge grow better.

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