Thursday, October 25, 2012

गठरी...


तुम्हारे साथ गुज़रे वक़्त की
यादों भरी गठरी
बड़ा लालच दिलाती है,
मैं अक्सर
रुक नहीं पाता
ज़रा सी गाँठ ढीली कर
पकड़ लेता हूं
पल कोई..

कभी
जब खोलता हूं मैं
बंधी मुट्ठी,
तो इक रंगीन सी तितली
चमकते पंख फ़ैलाए
मेरे कमरे में सतरंगी उजाला छोड़ जाती है,
तुम्हारी झील सी आँखें
तुम्हारी रात सी ज़ुल्फ़ें
तुम्हारा चाँद सा चेहरा
तुम्हारे मुस्कुराते लब,
मेरी बेरंग सी दुनिया में रंगत फूंक देते हैं..

कभी
ये हाथ
गठरी से
निकलने भी नहीं पाता,
हथेली झनझनाती है
लहर सी दौड़ जाती है
सपोला एक ज़हरीला
मुसलसल वार करता है,
जलन का
जिस्म की हर तह तलक एहसास होता है,
पलक गिरने सी लगती हैं
ये धड़कन थम सी जाती है
तो सांसें फड़फड़ाती हैं
मेरी बेरंग सी दुनिया में अन्धेरा सा छाता है..

मैं तितली को
अगर हाथों में भर लूं
कैद कर लूं
तो वहीं दम तोड़ देती है,
अगर आज़ाद रहने दूं तो उड़ के भाग जाती है
वो रंगत लौट जाती है..

सपोला
सरसराता
जा के छुप जाता है कोने में
कभी ढूंढे नहीं मिलता
कभी मारे नहीं मरता,
कई हफ़्तों तलक
सूजन बनी रहती है
आँखों मे..

कई दिन की तड़प के सामने
कुछ पल की रौनक है,
मगर
मैं रुक नहीं पाता,
ज़रा सी गाँठ ढीली कर
पकड़ लेता हूं
पल कोई,
तेरी यादों की
गठरी से...



बहरः हज़ज (1222)

10 comments:

  1. सुन्दर....बहुत सुन्दर...

    अनु

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  2. सुंदर और कोमल अह्सासो को व्यक्त करती..
    बेहतरीन रचना..
    अति उत्तम....
    :-)

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  3. sundar ati sundar kya bat hain ....

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  4. अहसासों की बेहतरीन प्रस्तुति,,,,उम्दा पोस्ट ,,,,

    RECENT POST...: विजयादशमी,,,

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  6. वाह ... बहुत ही बढिया।

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  7. मैं रोक नहीं पाता खुद को,कोई पल पकड़ ही लेता हूँ .... अपनी सी अभिव्यक्ति

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  8. गजब प्रस्तुती कोई शब्द नही बोलने को मन को भा गयी ...लिखते रहिएगा आपकी पोस्ट पढ़ने में मज़ा आता है।

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  9. सभी का बहुत बहुत शुक्रिया..

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