Saturday, October 22, 2011

फिर से बात वही है..


जिस बात पे रोया था, फिर से बात वही है,
जिस रात ना सोया था, फिर से रात वही है..

जज़्बात जगाती हुई, बरसात वही है,
अंजाम भी होगा वही, शुरुआत वही है..

जिसमें कि पड़ गये थे मेरी अक़्ल पे पर्दे,
बस शख़्स ये नया है, मुलाक़ात वही है..

लगता था टूट कर तो सुधर जाएगा लेकिन,
कमबख़्त दिल की सारी ख़ुराफ़ात वही हैं..

सोचा था तजुर्बे से कुछ तो राज़ खुलेंगे,
पर इश्क़ की राहों के तिलिस्मात वही हैं..

है जुर्म भी ऐसा, कि मुक़दमा नहीं कोई,
चालें भी पुरानी हैं वही, मात वही है..

पत्थर को उनके, दिल की शक़्ल दे भी दूं अग़र,
तोड़ेगा ही कुछ, उसकी तो औक़ात वही है..

वो दें दग़ा तो दें भले, तू दे वफ़ा 'घायल,
तेरी भी यही है, जो उनकी ज़ात वही है..


Tuesday, October 11, 2011

मुझे बीमार रहने दो..


दवा ना दो, दुआ ना दो, मुझे लाचार रहने दो,
मज़ा ये दर्द देता है, मुझे बीमार रहने दो..

ये मज़हब-धर्म की बातें हैं सब बेकार, रहने दो,
जिसे अपनी ख़बर ना हो उसे अख़बार, रहने दो..

वो गुज़रेंगे गली मेरी से, है अफ़्वाह ग़रम ऐसी,
तो ले आओ जनाज़ा, क़ब्र भी तैयार रहने दो..

जो चाहते हो कि मर जाऊं, मग़र ना हो निशां कोई,
तो बस इक़रार भर कर दो, ये-सब हथियार, रहने दो..

ये माना प्यार के बाज़ार के रस्ते नहीं मुश्क़िल,
मुझे दे दो वफ़ा, राहें भले दुश्वार रहने दो..

मुझ-ही से सीखकर तरक़ीब, मुझपर आज़माते हो,
के थोड़ी सी श़रम बाक़ी, मिंयां-मक्कार, रहने दो..

हंसी मेरी, खुशी मेरी, सभी कुछ छीन लो लेकिन,
कलम मेरी, मेरा काग़ज़, ये बस दो यार रहने दो..

वफ़ा की आस में जीते हुए ही मर गया 'घायल',
के अब तौबा से क्या होगा, उन्हे ग़द्दार रहने दो..


Friday, October 7, 2011

शुक्र है..शुक्रवार है..#23


कभी थोड़ी, कभी थोड़ी-सी बेहिसाब पीता हूं,
मिलाकर जाम में, कड़वे से कुछ जवाब पीता हूं,
लहू जो एक दूजे का हैं पीते, नेक वो बंदे,
बुरा मैं हूं बहुत ही आदमी, शराब पीता हूं..


Thursday, October 6, 2011

हों बुरे, या हों भले, लम्हे बीत जाते हैं..


मुझे दिल, दिल को मैं अक्सर, यही समझाते हैं,
हों बुरे, या हों भले, लम्हे बीत जाते हैं..

जो बह गये, तो-ही आँखों के अश्क़ पानी हैं,
जो रह गये, तो बन तेज़ाब दिल जलाते हैं..

मैं-तो अब-भी ग़ुज़रता हूं, उन्ही की गलियों से,
ये अलग बात है, अब वो नहीं बुलाते हैं..

बड़ा सुकून मिला, दिल मेरा, जब से टूटा,
बिना तक़लीफ, नए लोग आते-जाते हैं..

जो मतलबों से दें प्यासे को पानी, क़ाफिर वो,
वो फरिश़्ते, जो दिलजलों को मय पिलाते हैं..

ये ज़रूरी नहीं, हर बात का मतलब निकले,
कभी-दिल और-मैं, बेवजह भी बड़बड़ाते हैं..

ना महफ़िलो की, ना साक़ी की ज़रूरत है कोई,
मैं-और-मय ख़ुद ही, एक दूजे को पिलाते हैं,

ज़हन के ज़ख़्म से 'घायल' हूं, हाल क्या होगा,
बदन की चोट पे, लब खुल के मुस्कुराते हैं..

Friday, September 30, 2011

शुक्र है..शुक्रवार है..#22


बड़ा माहिर हूं, ख़ुद को ख़ुद से मैं छुपाने में,
खुशी-ग़म-और सभी एहसास मैं दबाने में,
जो सच में चाहते हो, सच से मेरे, मिलना तुम,
ज़माने में नहीं, मुझसे मिलो मयखाने में..

Tuesday, September 27, 2011

रेत और पानी..


कल एक बनते हुए मकान के बाहर रेत के एक ढेर को देखा,
ऊपर से पानी छिड़क कर गीला किया हुआ था,
कुछ ही देर में धूप से पानी उड़ गया,
रेत सूख गया,
और हवा के थपेड़ों से, रेत के कण उड़कर बिखरने लगे..
ना जाने क्यूं लगा, कि मैं भी उसके जैसा ही हूं,
कई दिनो से मन और मस्तिष्क में बहुत अशांति थी,
कुछ सवाल थे,
जितना जवाब खोजने का प्रयास बढ़ता,
उतनी ही अशांति बढ़ती जाती..
सूखे रेत को उड़ता देख कर,
कुछ जवाब मिले..
मैं भी रेत जैसा ही हूं,
जब तक गीला हूं, इकट्ठा हूं, बंधा हूं, एक हूं..
लेकिन अक्सर ही असफलताओं, ग़मों, तनावों,
ख्वाहिशों और मजबूरियों की धूप से सूख जाता हूं,
और फिर धोखों, बंदिशों, और
सबकी अपेक्षाओं को पूरी करने के दबाव की हवाओं के थपेड़े,
मुझे उड़ाकर इधर-उधर बिखेरने लगते हैं..
ख़ुद पर से विश्वास उठने लगता है,
अपनी क़ाबिलियत, अपनी दृढ़ता, अपना संयम,
सब खो बैठता हूं..
अब सवालों की संख्या घटकर सिर्फ एक रह गई है,
मुझे जरूरत है गीला रहने की,
बंधा, पूरा और एक रहने की,
बिल्कुल उस रेत के ढेर की तरह..
मुझे बस अपना पानी ढूंढना है,
अपना पानी ढूंढना है..

Friday, September 23, 2011

शुक्र है..शुक्रवार है..#21


कभी तो रीत दुनिया की, मिलन होने नहीं देती,
कभी पैसे की किल्लत, बीच की दूरी बढ़ाती है,
करे देरी से मिलने पर भी, नख़रा ना गिला कोई,
मेरे महबूब से बेहतर तो मेरी बोतल-ए-मय है..