Tuesday, July 24, 2012

बहुत हुई फ़िकर ज़माने की..


ये महफ़िलें मेरे जनाज़े की, हैं कोशिशें उन्हे बुलाने की,
जो आए ठीक से नहीं अब तक, जिन्हे लगी हुई है जाने की..

फ़िज़ूल में ही मैं परेशां था, ये कोई बात थी छुपाने की,
मुझे लगी है याद करने की, उन्हे लगी है याद आने की..

अजीब रस्म हैं मुहब्बत की, अजीब इश्क के फ़साने है,
जो आग दिल में यां लगाता है, उसी को बस ख़बर बुझाने की..

वो याद रात भर जगाती थी, तो ठान ली उसे मिटा दूंगा,
ग़ुजर नहीं रहें हैं अब दिन भी, वाह जद्दो-जहद भुलाने की..

हुए हैं जब से मेरे दिल के सौ, बड़े ही खुश हैं साथ में टुकड़े,
था एक दिल तो दिल अकेला था, है अब तो मौज हर दिवाने की..

नहीं रही है दोस्ती माना, ये दुश्मनी भी इक मरासिम है,
बचा उसे, बचा है जो बाक़ी, ग़ुज़र गई घड़ी मनाने की..

निकाल दे जो दर्द है दिल में, मैं सुन रहा हूं ग़ौर से तेरी,
बुरा ना मान मेरे चेहरे का, इसे तो लत है मुस्कुराने की..

बड़े बड़े ये महल आलीशां, ये सब के सब तुम्हे मुबारक हो,
जो दिल में घर बना के रहते हैं, वो सोचते नहीं ठिकाने की..

जो है मेरा मुझे मिलेगा वो, जो खो गया वो था ही कब मेरा,
कि आदमी की ही तरह किस्मत, लिखी हुई है दाने-दाने की..

ज़बां पे जो कभी नहीं आए, वो लफ़्ज़ यूं गिरे हैं काग़ज़ पर,
कभी मैं जिन को ले के रोता था, वो बात हो गईं हैं गाने की..

ख़ुदा मैं शुक्रिया जताने को, उठाऊं हाथ कौन सा कह दे,
इसे है आरज़ू लुटाने की, इसे हैं हसरतें गंवांने की..

भला बुरा किसे पता 'घायल', ये आदमी नहीं ख़ुदा कोई,
चलो करें जो दिल कहे अपना, बहुत हुई फ़िकर ज़माने की..

Friday, July 20, 2012

शुक्र है..शुक्रवार है..#39__(तन्हाई..)


हरी धरती, भरा सागर, खुला अम्बर है तन्हाई,
कभी जो साथ ना छोड़े, वही रहबर है तन्हाई,
यही बस एक साथी है, यही बस एक काफ़ी है,
हज़ारों अजनबी चेहरों से तो, बेहतर है तन्हाई..

बड़े ही ग़ौर से बैठी, मेरी हर बात सुनती है,
मैं सारी रात कहता हूं, ये सारी रात सुनती है,
कभी ऐसा भी होता है, मैं लब से कह नहीं पाता,
ये मेरी आँख से बहते हुए, जज़्बात सुनती है..

कभी हम साथ बैठे, चाँद को मामा बनाते हैं,
कभी गिन-गिन के तारे रात भर, आँखें सुजाते हैं,
कभी बिखरे हुए ख़्वाबों के टुकड़े, साफ़ करते हैं,
कभी फिर जोड़ कर टुकड़े, नए सपने सजाते हैं..

मुझे हर पल समझ देती हुई, ठोकर है तन्हाई,
मैं घर से दूर जब भी हूं, तो मेरा घर है तन्हाई,
यही बस एक साथी है, यही बस एक काफ़ी है,
हज़ारों अजनबी चेहरों से तो, बेहतर है तन्हाई..

Monday, June 11, 2012

बूंदे...


कभी बादलों से, बरसती हैं बूंदें,
कभी अश्क़ बनकर, तरसती हैं बूदें,
कभी प्यास सबकी, बुझाती हैं बूंदें,
कभी आग़ दिल में, लगाती हैं बूंदें..

कभी बन पसीना, हैं ठंडक दिलाती,
कभी बन परेशानी, माथे पे आती,
हों कम तो हलक को, सुखाती हैं बूंदें,
हों ज़्यादा तो सब कुछ, बहाती हैं बूंदें..

जो बूंदों का संग हो, तो मुस्काए गागर,
जो बूंदो से जुड़ जाएं बूंदे, तो साग़र,
जो ग़र कद्र ना हो, मिटाती हैं बूंदें,
जो सीखो तो जीना, सिखाती हैं बूंदें..

जिसम में, ज़मीं में, हवा में हैं बूंदें,
जहां भी जहां है, जहां में है बूंदें,
जो सोचो तो जीवन, चलाती हैं बूंदें,
जो देखो तो दुनिया, बनाती हैं बूंदे..

Friday, June 1, 2012

यही दो दिन तो होते हैं, कि मैं नौकर नहीं होता (शुक्र है..शुक्रवार है..#38)


शुकर है आज शुक्करवार है, घर खुश मैं जाऊंगा,
हंसूंगा, खूब बोलूंगा, थकन सारी मिटाऊंगा..

कोई पिक्चर, कोई नाटक, कोई नॉवल, खबर कोई,
या पत्ते दोस्तों के संग, कोई क्वाटर, बियर कोई,
मैं पूरी रात जागूंगा, सुबह जाकर मैं सोऊंगा,
उठूंगा जब करेगा दिल, नहाऊंगा न धोऊंगा..

न कोई शर्ट, ना ट्राउसर, न कोई बेल्ट, ना जूते,
कोई ढीला सा इक लोअर, टंगी टी-शर्ट जो खूंटे,
मैं खुल के लूंगा अंग्ड़ाई, मैं जी भर के जंभाऊंगा,
जहां खुजली लगेगी, ठीक उस जगहा खुजाऊंगा..

न शाही वेज, न तंदूरी, न कोई और ही धोखा,
मेरे मन में जो आएगा, मेरी थाली में वो होगा,
कहीं से देख रेसीपी, मैं कोई डिश बनाऊंगा,
मिलाके फ़ोन मम्मी को, कहानी फिर सुनाऊंगा..

पुराने दोस्तों से, कुछ पुरानी बात की बातें,
वो कुछ मस्ती भरे किस्से, वो अपनी मौज की रातें,
ज़रा सी देर लम्हों को, मैं कुछ वापस घुमाऊंगा,
किसी को याद कर लूंगा, किसी को याद आऊंगा..

यही दो दिन तो होते हैं, किसी का डर नहीं होता,
यही दो दिन तो होते हैं, कि मैं नौकर नहीं होता,
यही बस सोच कर, फिर से ज़रा दिल को मनाऊंगा,
शुकर है आज शुक्करवार है, घर खुश मैं जाऊंगा..

Friday, May 18, 2012

शुक्रवार भजन... (शुक्र है..शुक्रवार है..#37)


हे शुक्रवार भगवान..
हे शुक्रवार भगवान..

तू ही हंसाता, पिलाता तू ही है,
तू ही हंसाता, पिलाता तू ही है,
तू ही बस देता आराम..
हे शुक्रवार भगवान..

आई.टी. नौकर, का तू स्वामी,
आई.टी. नौकर, का तू स्वामी,
तेरा ही बस गुणगान..
हे शुक्रवार भगवान..

तू ही चढ़ाए, तू ही उतारे,
तू ही चढ़ाए, तू ही उतारे,
वीकेंड की हर शाम..
हे शुक्रवार भगवान..

तू जब आता, तब खुशी लाता,
तू जब आता, तब खुशी लाता,
ये जीवन तेरे नाम,
हे शुक्रवार भगवान..
हे शुक्रवार भगवान.. !!

Friday, May 11, 2012

शुक्र है..शुक्रवार है..#36


इक बोतल दो प्याले ले आ,
नाटक मत कर साले, ले आ,
हाँ सुन, चखने का सामान भी,
और दस-बारह धूम्र-पान भी,
जल्दी आजा, देर ना करियो,
दिन ही दिन, अंधेर ना करियो,
आजा कुछ माहौल बनाएं,
'शुक्रवार की शाम' मनाएं,
दिन हैं पूरे पाँच बिताए,
इस इक दिन की आस लगाए,
कम्प्यूटर को छोड़ के आजा,
टर्न्सटाइल को तोड़ के आजा,
धीमे-धीमे ग़ज़ल बजाएं,
साहिर-ग़ालिब को बुलवाएं,
काम किसीका खत्म हुआ है?,
ये तिलिस्म कब भस्म हुआ है?,
गोली ना दे, समझा साले,
यार हुं मैं, या क्लाइंट वाले?
कोई बहाना गा के आजा,
बहलाके फ़ुसला के आजा,
कुछ तो शर्म जगाले, ले आ,
सोडा किनली वाले ले आ,
इक बोतल दो प्याले ले आ,
नाटक मत कर साले, ले आ !!

Friday, May 4, 2012

दो बातें..


तुझे पाने की खुशी भी कोई भरम ही थी,
तेरे जाने का ग़म भी ग़म नहीं है सच्चा सा,
तुझे तड़पाने की भी कोई आरज़ू है नहीं,
के मैने कुछ नहीं खोया, हैं खोया तूने मुझे..
जो खटकती हैं दिल को बार बार रह रह कर,
है बात बस दो, एक बीत गई, इक होनी..
इक, काबिल नहीं तू मेरे, देर से जाना,
तुझे वो सब दिया, थी जिसकी तू हक़दार नहीं..
दुजा, ग़र मुझसे कोई असली मोहब्बत कर ले,
ये एहतियात मेरी दुख न उसको पहुंचाए,
जो उसका हक़ हो इश्क़ में उसे मिले पूरा,
मेरी चाहत में कहीं कुछ कमी न रह जाए,
मेरी चाहत में कहीं कुछ कमी न रह जाए..