अभी आग़ाज़ है महफ़िल का, अभी मौज कहां,
ज़रा महौल जो गर्माए, तो कुछ बात बने..
नहीं आता मज़ा अब, पी के लुड़क जाने में,
मैं पियूं और वो लड़खड़ाए, तो कुछ बात बने..
जो कह नही पाता मैं, वो धड़कने कह दें,
ज़रा दिल कोई यूं धड़काए, तो कुछ बात बने..
वो जितनी बार बदले राहें, मुझसे दूरी को,
वो आके मुझसे ही टकराए, तो कुछ बात बने..
जिसे हर शख़्स, बेहया के नाम से जाने,
वो मेरे नाम पे शर्माए, तो कुछ बात बने..
वो भड़क जाए, सुनके नाम मेरा, ऊपर से,
मन-ही-मन मगर इतराए, तो कुछ बात बने..
ये सच नहीं, कि मैं बहकाए में नहीं आता,
कोई बहका हुआ बहकाए, तो कुछ बात बने..
यही कोशिश रही सदा, के कोई ना रूठे,
कभी कोई मुझको भी मनाए, तो कुछ बात बने..
बात सीधी हो अगर, वो असर नहीं करती,
ज़रा लफ़्ज़ों को जो उलझाए, तो कुछ बात बने..
कोई हिसाब नहीं, पीठ में खंजर कितने,
कोई सीने में जो घुसाए, तो कुछ बात बने..
TBC..