Thursday, June 16, 2011

नहीं सीने में दिल जिनके, उन्हे दिल हार बैठे हैं..


उन्हे कहते है गुल हम, और हमें वो ख़ार कहते हैं,
नहीं सीने में दिल जिनके, उन्हे दिल हार बैठे हैं..

कई तरहा से दिल तोड़ा, हर इक टुकड़े में वो निकले,
जलाया एक अरमां जब कभी, दो बीज बो निकले,
वही ख़्वाबों मे, वो ही तोड़ते हर बार रहते हैं,
नहीं सीने में दिल जिनके, उन्हे दिल हार बैठे हैं..

सलीके से बड़े, दामन वो अपना साफ़ रखते हैं,
न जाने क़त्ल करके, कैसे ख़ुदको पाक़ रखते हैं,
हमें करके दिवाना, ख़ुद बने हुशियार रहते हैं,
नहीं सीने में दिल जिनके, उन्हे दिल हार बैठे हैं..

हर इक कोशिश गई बेकार, उनको रास आने की,
ख़यालों से मेरे, उनको हसीं एहसास लाने की,
हमें हैं देखते यूं के, बड़ी मुश्क़िल से सहते हैं,
नहीं सीने में दिल जिनके, उन्हे दिल हार बैठे हैं..

कभी तो यूं भी हो के देखकर, हमको वो मुस्काएं,
ना हों रुसवा, ना चेहरे पर ज़रा भी वो शिकन लाएं,
कभी पिघलेंगे वो, ये सोच दिल सुलगाए बैठे हैं,
नहीं सीने में दिल जिनके, उन्हे दिल हार बैठे हैं..

उन्हे कहते है गुल हम, और हमें वो ख़ार कहते हैं,
नहीं सीने में दिल जिनके, उन्हे दिल हार बैठे हैं..

Saturday, June 4, 2011

उठी जो बात है दिल में, बाहर आएगी ज़रूर..



   
उठी जो बात है दिल में, बाहर आएगी ज़रूर,
ना लब पे आई तो, कागज़ पे तो आएगी ज़रूर..

गई वो यूं, के मुड़के भी ना देखा एक दफ़ा,
दिया जो दिल था मुझे, लेने तो आएगी ज़रूर..

ना मोहब्बत सही, वहशत या वो उल्फ़त ही सही,
कोई तो चीज़, उसके दिल पे भी छाएगी ज़रूर..

नहीं किस्मत में खुशी मेरी, ये उम्मीद मगर,
ना सही जानके, भूले से, पर आएगी ज़रूर..

सभी वो छोड़ गये, जिसको भी दिल ने चाहा,
हुई है ग़म से मोहब्बत, रंग लाएगी ज़रूर..

अदा है, या तेरी दीवानगी ये है 'घायल',
उठा जो दर्द अगर, तो हंसी आएगी ज़रूर..

Friday, June 3, 2011

शुक्र है..शुक्रवार है..#13




ज़रा सी खोल दूं बोतल, ज़रा सा जाम फिर भर लूं,
अभी कुछ होश बाकी है, बेहोशी आम फिर कर लूं,
सुबह से अब तलक, दुनिया बुरी बस है नज़र आई,
चढ़ा के मय का चश्मा, ख़ूबसूरत शाम फिर कर लूं..

Tuesday, May 31, 2011

दिल करता है..


दिल करता है कि,
कोई कागज़ का छोटा सा टुकड़ा,
कोई उलझा हुआ धागा,
या कोई अजीब सा पत्थर उठाकर,
फिर से पापा की गोदी में बैठकर,
एक ख़ामख़ां का सवाल करूं,
'पापा ये क्या है'..

कोई जवाब अब मुझे इतनी तसल्ली क्यूं नहीं देता..

दिल करता है कि,
फिर भागते-भागते घर में घुसूं,
और सीधा रसोई में जाकर,
कभी कोई सूखा हुआ पत्ता,
जिस पर किसी कीड़े ने,
कोई तस्वीर बनाई हो,
कभी कोई टूटी हुई लकड़ी,
या शीशे की बोतल में बंद किया हुआ,
जुगनू दिखाकर बोलूं,
'मुम्मी देखो मुझे क्या मिला'..

कोई ख़ज़ाना अब मुझे इतनी ख़ुशी क्यूं नहीं देता..

दिल करता है कि,
फिर पापा का हाथ पकड़ कर,
बिना रास्ते के डर के,
बिना मंज़िल की फ़िक्र के,
युंही आधा लटका हुआ,
लहराता हुआ, गाता हुआ,
चलता चला जाऊं..

कोई सहारा अब मुझे इतना यकीं क्यूं नहीं देता..

दिल करता है कि,
कुछ फ़ाल्तू की बकर-बकर करते हुए,
कभी बालों मे हाथ फ़िरवाते हुए,
कभी साड़ी के पल्लू का सिरा चबाते हुए,
उल्टा-सीधा, टेढ़ा-मेढ़ा होकर भी,
गहरी, चैन भरी नींद में,
फिर मम्मी के पेट पर सो जाऊं..

कोई मख़मली बिस्तर अब मेरी रातों को सुकून क्यूं नहीं देता.

Saturday, May 28, 2011

ज़ुबां से उनकी, मेरा नाम तो निकले..




इज़हार-ए-इश्क़ फिर है, निकले फिर अंजाम जो निकले,
बहाना है, ज़ुबां से उनकी, मेरा नाम तो निकले..

सुबह होते ही घर से, ये दुआ लेकर निकलता हूं,
बने जो सिर्फ मुझसे, आज उनको काम वो निकले..

ज़ुबां से हर तरह भेजा, मगर ना कान तक पहुंचा,
के पहुंचे दिल तलक, इस दिल से अब पैग़ाम जो निकले..

मैं जमके ठान बैठा था, के उनको भूल जाऊंगा,
हुए पुर्जे इरादों के, वो घर से शाम को निकले..

अभी तक तो कभी मुझपर, नहीं उंगली उठी कोई,
वफ़ा का बेवफ़ा से हो, कोई इल्ज़ाम जो निकले,

बड़ी ज़िल्लत मिली, जब भी हूं गुज़रा उस गली से मैं,
कभी तो हो, के दर मेरा हो और बदनाम वो निकले..

हुआ जो इश्क़ तो भी, और मिला इनकार तो 'घायल',
सुनाया हाल-ए-दिल इक यार को, और जाम दो निकले..!!

Friday, May 27, 2011

शुक्र है..शुक्रवार है..#12




जो आते हैं ये बादल, क्यूं भला दिल सा मचलता है,
क्यूं आती याद है मय, क्यूं ना उस-बिन दिल बहलता है,
हमें तो शक़ है यूं के, बादलों के पर्दे के पीछे,
वो ख़ुद हाथो में लेकर जाम, मस्ती में टहलता हैं..!

Wednesday, May 25, 2011

टूटे सपने..




कभी मन मार लेता हूँ, कभी लगता हूँ रब जपने,
वो अब भी याद आते हैं, मुझे टूटे मेरे सपने..

सभी ने दी सलाह वो काम कर, दिल को मज़ा जो दे,
ख़ुदा से पूछ, करता चल, अगर बस वो रज़ा जो दे,
ये दिल नायाब है, अनमोल हैं ये धड़कनें सारी,
कभी ना काम ऐसा कर, तेरे दिल को सज़ा जो दे..

दिखा के दूर से जन्नत, कदम लूटे मेरे सबने,
वो अब भी याद आते हैं, मुझे टूटे मेरे सपने..

जला के आँख के सपने, कई रातें जगे काटी,
चली जो आरज़ू मेरी पे, वो बंदिश भरी लाठी,
कभी रस्मों ने दुनिया की, कभी झूठे रिवाज़ों ने,
गला घोटा दबी आशाओं का, इच्छा सभी छाँटी..

सरकते रेत से, हाथों से सब छूटे मेरे अपने,
वो अब भी याद आते हैं, मुझे टूटे मेरे सपने..

जलाने ही थे सारे ख़्वाब तो मुझको दिखाए क्यूँ,
गुनाह है जिनपे चलना, रास्ते वो थे सिखाए क्यूँ,
नहीं मालूम था वो ख़्वाब, बस बचपन में ही सच थे,
है अब अफ़सोस ये, जल्दी में लम्हे थे बिताए क्यूँ..

ना तब मालूम था, अरमान-ए-दिल यूं थे मेरे तपने,
वो अब भी याद आते हैं मुझे, टूटे मेरे सपने..