Sunday, April 10, 2011

तरीक़ा कोई तो होता, है कितना प्यार कह पाता..




इश्क़ मे जीत मिल जाती, तो मैं हर हार सह जाता,
तरीक़ा कोई तो होता, है कितना प्यार कह पाता..

सुनी ना एक भी मेरी, सदा दिल ने जो दीं हर दम,
मैं हंसता था हंसाने को, ना वो समझे, मुझे है ग़म,
वो होते ख़ुश, तो ख़ुश होता, वो रोते थे, तो रोता था,
ज़ख़म मेरे जो दुख़ते थे, ना होती थी ये आँखें नम..

यकीं करते जो मेरे इश्क़ पे, इनकार सह जाता,
तरीक़ा कोई तो होता, है कितना प्यार कह पाता..

सभी तो देख कहते थे, के मैं बर्बाद होता हूं,
अकेला मैं भरम में था, के मैं आबाद होता हूं,
मैं उनको मांग, अपनी हर दुआ में, सांस लेता था,
मैं ख़ुश हो सोचता था, उनकी मैं फ़रियाद होता हूं..

किनारे राह गर तकते, मैं हर इक बार बह जाता,
तरीक़ा कोई तो होता, है कितना प्यार कह पाता..

के सारी कोशिशें कर ली, मुझे दिल में पनाह दें वो,
भले थोड़ी सही, कोने में ही, मुझको जगाह दें वो,
सभी इल्ज़ाम उनके, हूं मैं राज़ी नाम लेने को,
बुलाएं तो मुझे इक बार, चाहे बस गुनाह दें वो..

जिसे वो चूमते, उस फूल का बन ख़ार रह जाता,
तरीक़ा कोई तो होता, है कितना प्यार कह पाता..

समझ ना पाया उनकी बेरुख़ी को, ज़िंदगी भर मैं,
वो थे गर पाक़, उनकी आँख में, था गंदगी भर मैं,
मुझे क़ाफ़िर समझते वो, समझता मैं ख़ुदा उनको,
उन्ही के सामने झुकता, उन्ही की बंदगी पर मैं..

ज़रा इज़हार तो करते, उन्हे बेज़ार सह जाता,
तरीक़ा कोई तो होता, है कितना प्यार कह पाता..

जो टूटा है, उन्ही की बद्दुआ का है असर सारा,
धड़कता है ज़रा थम के, धड़कता है मगर मारा,
उन्ही के साथ की चाहत में ही, सब ज़ख़्म खाए हैं,
उन्ही को चाहता फिर भी, उन्ही का साथ है प्यारा..

वो गर अपना बना लेते, मैं हर इक वार सह जाता,
तरीक़ा कोई तो होता, है कितना प्यार कह पाता..!!

* ख़ार - काँटा ( Thorn )
* बेज़ार - नाराज़ / नाख़ुश ( Displeased/ Angry)


Saturday, April 9, 2011

मर्ज़ी से बड़े दिन बाद धड़कूंगा..




तू क्या छोड़ेगी मुझको, मैं ही तुझको छोड़ जाऊंगा,
यकीं टूटा है मेरा, ख़्वाब तेरे, तोड़ जाऊंगा,
भुला दूंगा तुझे मैं, और तुझसे इश्क़ को भी हाँ,
जिसे टुकड़े किया तूने, उसे भी जोड़ जाऊंगा..

जो वादे थे किये मुझसे, ना उनकी आस रखूंगा,
गुज़ारे संग जो, ना इक भी लम्हा ख़ास रखूंगा,
ये ना तू सोचना, के सोच तुझको, आएंगे आँसू,
रहा गर मैं दुखी, तो ग़म तेरे भी पास रखूंगा..

बड़ा तड़पा हूँ संग तेरे, ना तेरे बाद तड़पूंगा,
वफ़ा अपनी, जफ़ा तेरी, ना मैं कर याद भड़कूंगा,
कभी रुकता-ओ-चलता था, ये तेरे आने जाने से,
बड़ा खुश है, के मर्ज़ी से बड़े दिन बाद धड़कूंगा..

ना इक भी अब खुशी, हिस्से की अपने मैं गंवांऊंगा,
तेरी मुस्कान ख़ातिर, अब ना अपनी मैं उड़ाऊंगा,
जियूंगा इस तरह से कुछ मैं, बाकी ज़िन्दगी अपनी,
के तुझको छोड़, बाकी सब पे खुशियां मैं लुटाऊंगा..

Friday, April 8, 2011

शुक्र है..शुक्रवार है..#5

 
बढ़ा दे जो खुशी, पी ले जो ग़म, वो जाम ही तो है,
सही बदनाम कितनी भी, मगर कुछ काम की तो है,
सभी कुछ बांट डाला है, रईसों मे गरीबों में,
बची बस मय ही है,अब-भी अमीर-ओ-आम की जो है..

Friday, April 1, 2011

शुक्र है..शुक्रवार है..#4




कहो मुझको मगर, पहले ये जानो क्या शराबी है,
हाँ पीता हूँ, मैं पीता हूँ, ना इसमें शक़ ज़रा भी है,
जो मीठा सा ज़हर तोड़े है दिल, उससे तो ये बेहतर,
बना दे यार दुश्मन को भी, इसमें क्या ख़राबी है.. !!

Tuesday, March 29, 2011

आँखें..



गला सूखा तड़पता, आँख ये नम हो कराहती हैं,
बुझेगी प्यास कैसे, नीर सारा दे बहाती हैं..

करूं गर बंद पलकें, तो 'उन्हे' हैं देख रो देती,
ना गर झपकूं, तो पाने को झलक इक, दौड़ जाती हैं..

गुज़ारी रात पूरी फिर है, कल खिड़की पे ही बैठे,
उजाले में कभी परछाई में, 'उनको' दिखाती हैं..

कभी पूनम का गर गलती से, इनको चाँद दिख जाए,
बड़ी खुश हो ये, 'उस' चेहरे पे इक टक दे जमाती हैं..

सुबह क्यूं सूजती हैं, ढूँढा जब ये राज़ तो जाना,
ये 'उनको' देख ख्वाबों मे, खुशी से फूल जाती हैं..

नहीं मुमकिन खुली रहके है, 'उनको' देख पाना तो,
ये धड़कन थाम, सांसें रोक भी, दीदार चाहती हैं.. 

Saturday, March 26, 2011

मरता भी नहीं है ये..


मोहब्बत क्या सितम है, अब तलक एहसास करता हूं,
मैं जिसके वार से घायल, उसी की आस करता हूं,
बेहोशी में, ख़यालों में जो उनके, आह भर बैठूँ,
तो कहते हैं, कड़ी जां हूँ, अभी तक सांस भरता हूँ..

उन्हे क्या इश्क़ समझाऊं, लिये सीने में पत्थर हैं,
ना वाइस मैं सही, तो वो भी मुझसे ख़ाक बेहतर हैं,
मगर दिल है जो ठहरा है, के उनकी हो झलक हासिल,
बिना दीदार उठ जाऊं, तो फिर क्या और बद्तर है..

नहीं किस्मत वो इस दिल की, समझता भी नहीं है ये,
तड़पता है, बिना उनके, धड़कता भी नहीं है ये,
किये तैयार बैठे हैं जनाज़ा, जो मेरे दर पे,
तमाशा देख कहते हैं, लो मरता भी नहीं है ये..!!

Friday, March 25, 2011

शुक्र है..शुक्रवार है..#3




अरे नादान लोगों, छोड़ दो मय को बुरा कहना,
उन्हे जीना सिखाती है, जिन्हे भाता मरा रहना,
ना बाहर बैठ कर बोलो, के आओ बीच मैदां में,
ज़रा दो जाम लो भीतर, ना भाए तो ज़रा कहना..!!